अम्बिकापुर। विजयादशमी के पावन अवसर पर सरगुजा रियासत की ऐतिहासिक धरोहर श्री रघुनाथ पैलेस में राजसी परंपरा, धार्मिक आस्था और सांस्कृतिक विरासत का भव्य संगम देखने को मिला। सदियों से चली आ रही परंपरा का निर्वहन करते हुए पूर्व उप मुख्यमंत्री टी.एस. सिंह देव, राजा अरुणेश्वर शरण सिंह देव और युवराज आदित्येश्वर शरण सिंह देव ने विधि-विधान के साथ कुलदेवी, नवग्रह और पारंपरिक शस्त्रों का पूजन किया। इस दौरान सरगुजा संभाग सहित पूरे प्रदेश की सुख-समृद्धि, शांति और खुशहाली की कामना की गई।
दशहरा के अवसर पर श्री रघुनाथ पैलेस में आयोजित धार्मिक अनुष्ठान को लेकर विशेष उत्साह रहा। रियासतकालीन परंपरा के अनुसार दोपहर 12 बजे पूजा-अर्चना प्रारंभ हुई। शंखध्वनि और वैदिक मंत्रोच्चार के बीच राजपुरोहितों के मार्गदर्शन में अनुष्ठान संपन्न कराया गया। पारंपरिक राजसी परिधान में उपस्थित राजपरिवार के सदस्यों ने पूजा के विभिन्न चरणों में भाग लिया।
शस्त्रों के साथ गज, अश्व और ऐतिहासिक नगाड़े का पूजन
विजयादशमी पर शस्त्र पूजन का विशेष महत्व रहा। श्री रघुनाथ पैलेस में रियासतकालीन अस्त्र-शस्त्रों के साथ शक्ति और विजय के प्रतीक गज (हाथी), अश्व (घोड़े), ऐतिहासिक ध्वज और पारंपरिक नगाड़े का भी विधिवत पूजन किया गया। इसके साथ नवग्रह शांति पाठ और विशेष आहुतियां अर्पित की गईं। धार्मिक अनुष्ठान के माध्यम से क्षेत्र में सुख, शांति और मंगल की कामना की गई।
पैलेस कचहरी में सजा पारंपरिक दरबार
पूजन संपन्न होने के बाद श्री रघुनाथ पैलेस स्थित कचहरी (दरबार) को आम नागरिकों के लिए खोला गया। दशहरा की शुभकामनाएं देने और राजपरिवार से मुलाकात करने के लिए अम्बिकापुर शहर के साथ आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों से भी बड़ी संख्या में लोग पहुंचे। दरबार में लोगों की उपस्थिति से पैलेस परिसर में उत्सवी माहौल देखने को मिला।
टी.एस. सिंह देव और युवराज आदित्येश्वर शरण सिंह देव ने दरबार में पहुंचे लोगों का आत्मीयता से अभिवादन स्वीकार किया और उन्हें विजयादशमी की शुभकामनाएं दीं। इस दौरान परंपरागत रूप से बधाई देने पहुंचे लोगों में खासा उत्साह रहा।
आस्था और विरासत का प्रतीक बना दशहरा आयोजन
श्री रघुनाथ पैलेस में विजयादशमी का आयोजन केवल धार्मिक अनुष्ठान तक सीमित नहीं रहा, बल्कि सरगुजा की ऐतिहासिक पहचान और सांस्कृतिक विरासत की झलक भी प्रस्तुत करता नजर आया। शस्त्र पूजन, रियासतकालीन प्रतीकों की पूजा और आम नागरिकों के लिए दरबार खोलने की परंपरा ने दशहरा उत्सव को विशिष्ट स्वरूप दिया। आयोजन के माध्यम से क्षेत्र की पुरानी परंपराओं और जनसंपर्क की विरासत का जीवंत रूप सामने आया।