आशीष कुमार गुप्ता
खड़गवां/मनेंद्रगढ़। गरीब परिवारों को पक्का मकान उपलब्ध कराने की सरकारी योजना में ही कथित भ्रष्टाचार का मामला सामने आने से पंचायत व्यवस्था पर सवाल खड़े हो गए हैं। जनपद पंचायत खड़गवां के ग्राम पंचायत सिंघत में प्रधानमंत्री आवास योजना (ग्रामीण) के तहत आवास निर्माण से जुड़ी मनरेगा मजदूरी के भुगतान में अनियमितताओं का आरोप लगा है। सोशल ऑडिट और प्राप्त दस्तावेजों के आधार पर सामने आए मामले में आरोप है कि मनरेगा मेट राजकुमार सिंह ने वास्तविक हितग्राहियों और मजदूरों के बजाय अपने परिजनों के जॉब कार्ड पर कथित तौर पर फर्जी डिमांड और हाजिरी दर्ज कराई। इसके बाद मजदूरी की राशि परिजनों के बैंक खातों में पहुंचने का आरोप है।
मामले ने इसलिए भी गंभीर रूप ले लिया है, क्योंकि एक ओर आवास निर्माण का काम अधूरा है, वहीं दूसरी ओर मजदूरी भुगतान की प्रक्रिया में कथित गड़बड़ी सामने आई है। अब सवाल यह है कि जिन हितग्राहियों को अपने घर पूरे होने का इंतजार है, उन्हें उनका पूरा लाभ कब मिलेगा और इस कथित वित्तीय अनियमितता के लिए जिम्मेदारी किसकी तय होगी?
66 में से 35 आवास अधूरे, फिर भी भुगतान पर सवाल
प्राप्त जानकारी के अनुसार, ग्राम पंचायत सिंघत में वर्ष 2025 तक कुल 66 आवास स्वीकृत किए गए थे। इनमें से 31 आवास पूर्ण होने की जानकारी है, जबकि 35 आवास अब भी अधूरे बताए जा रहे हैं। ऐसे में आवास निर्माण की वास्तविक प्रगति, मनरेगा के तहत दर्ज मजदूरी दिवस और संबंधित खातों में हुए भुगतान का मिलान जांच का महत्वपूर्ण बिंदु बन गया है।
आरोप है कि आवास निर्माण में काम करने वाले वास्तविक हितग्राहियों को मिलने वाली मजदूरी के बजाय अन्य जॉब कार्डों के माध्यम से भुगतान की प्रक्रिया अपनाई गई। यदि दस्तावेजों में दर्ज हाजिरी और वास्तविक कार्य में अंतर की पुष्टि होती है, तो यह सरकारी राशि के दुरुपयोग का गंभीर मामला हो सकता है।
आवास मित्र की भूमिका पर भी उठे सवाल
पंचायत से जुड़ी जानकारी के अनुसार, आवास मित्र के पद पर शुभम यादव का नाम दर्ज है। वहीं, आरोप है कि धरातल पर आवास मित्र से संबंधित कार्य मनरेगा मेट राजकुमार सिंह द्वारा संचालित किया जा रहा था। इस स्थिति में यह जांच जरूरी है कि आवास निर्माण की निगरानी, हितग्राहियों के सत्यापन और मजदूरी भुगतान से संबंधित जिम्मेदारियां किसके पास थीं तथा निर्धारित प्रक्रिया का पालन हुआ या नहीं।
पंचायत के जिम्मेदारों की भूमिका की जांच जरूरी
इस मामले में सरपंच फूलमती सिंह, पंचायत सचिव अनुराग दुबे और रोजगार सहायक अशोक सिंह की भूमिका को लेकर भी सवाल उठाए जा रहे हैं। ग्रामीणों और जानकारों की ओर से कथित मिलीभगत तथा निगरानी में लापरवाही की आशंका जताई गई है। हालांकि, इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि और संबंधित व्यक्तियों का पक्ष सामने आना अभी आवश्यक है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि जॉब कार्ड पर फर्जी हाजिरी दर्ज कराई गई और उसके आधार पर भुगतान हुआ, तो संबंधित मस्टररोल तैयार करने, सत्यापन करने तथा भुगतान स्वीकृत करने की प्रक्रिया में शामिल जिम्मेदारों की भूमिका क्या रही? क्या यह अनियमितता केवल मेट तक सीमित थी या फिर निगरानी व्यवस्था में भी गंभीर खामियां थीं? इसका जवाब दस्तावेजों की जांच और संबंधित अधिकारियों के स्पष्टीकरण से ही सामने आएगा।
जांच, वसूली और कार्रवाई पर टिकी निगाहें
मामले में अब जिला प्रशासन और जिला पंचायत के मुख्य कार्यपालन अधिकारी की कार्रवाई महत्वपूर्ण मानी जा रही है। जांच में जॉब कार्ड, मस्टररोल, मजदूरी भुगतान के रिकॉर्ड, बैंक खातों में पहुंची राशि, आवास निर्माण की भौतिक स्थिति और डिजिटल स्वीकृतियों का मिलान किया जाना चाहिए। इससे यह स्पष्ट हो सकेगा कि भुगतान वास्तविक कार्य के आधार पर हुआ या रिकॉर्ड में अनियमितता बरती गई।
यदि आरोप प्रमाणित होते हैं, तो नियमानुसार जिम्मेदार व्यक्तियों से राशि की वसूली, विभागीय कार्रवाई और आवश्यकतानुसार कानूनी कदम उठाए जाने का सवाल भी सामने आएगा। साथ ही, प्रभावित हितग्राहियों को उनकी पात्र मजदूरी का लाभ दिलाने और अधूरे आवासों को पूरा कराने की दिशा में ठोस कार्रवाई जरूरी होगी।
अब प्रशासन की जवाबदेही की बारी
सिंघत का यह मामला केवल मजदूरी भुगतान में कथित गड़बड़ी तक सीमित नहीं है, बल्कि सरकारी योजनाओं की निगरानी और गरीब हितग्राहियों तक लाभ पहुंचाने की व्यवस्था पर भी सवाल खड़ा करता है। अब देखना होगा कि प्रशासन शिकायत और उपलब्ध दस्तावेजों के आधार पर निष्पक्ष जांच कराता है या नहीं, और जांच का दायरा मेट तक सीमित रहता है अथवा भुगतान प्रक्रिया से जुड़े सभी जिम्मेदारों की भूमिका भी सामने लाई जाती है।